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Saturday, January 17, 2009

महावरी आँसू

दीवार से लगकर
पैरों की कैंची बना
दूर से शून्य ताक रही हो
खिड़की से आती धूप
तुम्हारी बाँई बांह छूती हुई
दीवार से लग ठहर गई है

मैं ओट में खड़ा
अपनी आस बांधे हुए
की शायद आज
तुम्हारी हाँ सुन पाऊंगा

देहली पर रुक कर
तुम्हारी बाहों से उतरती
धूप का साहारा ले
मेरी नज़रें तुम्हे तलाशती
पाँव पर आ कर रुकीं
और तभी
साँस भी गले में
रुक सी गई -
जब महावरी पाँव पर
तुम्हारी एक खुश्क सी
आँसू की बूँद
बस एक छोटी सी महावरी धार ही
अपने साथ मिटा सकी










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