मेरे आँगन में चेहेकती हुई गौरैया
अमरुद के पेड़ पर अमरुद कुतरती गिलहरी
और आरोही ....
धूप की तरह दौड़ती-फिरती हमारे आँगन में
किसी भी छोटी सी उलाहना के साए में
आँसूं छलकाती...
माँ के हाथ की बनी सोंधी रोटी
नन्हे हाथों में लिए बड़ी शान से
चिड़ियों को बांटती फिरती ...
हमारी गिलहरी 'आरोही'!
कल रात सपने में
अपनी सखी को झिड़कती हुई
होठों पर हलकी सी मुस्कान की छवी दिखा कर
फिर मीठी नींद में सो गयी
गौरैया सी हमारी 'आरोही'
दर्शन-चिंतन में मग्न हमारी ये नन्ही
हमारे जीवन को रोज़ नया आयाम देती हुई
आँगन में दौड़ती फिरती है दिन-रात
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