Search This Blog

Thursday, January 8, 2009

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना - निराले कवि!

Sarveshwar Dayal Saxena, the poet who brought in the 'prayogvaad' (experimentalism) poetry in Hindi - he haunts me all the time. All his poems quietly reach in and keep knocking all the time.

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है
तुम उसको मत वाणी देना।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूंगे अभ्यासों की,
यह सारी रचना का क्रम है,
बस इतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना

यह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है
सच्चाई है -
अंजानो को भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
यह गति है - हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है - रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ है,
यह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उनको मत वाणी देना

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह आदि मानव की भाँती है भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,
अंतराल है वह - नया सूर्य उगा देती है,
नए लोक, नई सृष्टि, नए स्वप्ना देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना

---------
तुम्हारी मुस्कान
कोहरे से छान कर नहीं
सीधी धूप सी आती है
जैसे सुबह सुबह
चिडियों का गान
तुम्हारी मुस्कान

--------------------

One of the very favourite ones that I always enjoy reading

काँच की बन्द खिड़कियों के पीछे
तुम बैठी हो घुटनों में मुँह छिपाए।
क्या हुआ यदि हमारे-तुम्हारे बीच
एक भी शब्द नहीं।
मुझे जो कहना है कह जाऊँगा

यहाँ इसी तरह अदेखा खड़ा हुआ,
मेरा होना मात्र एक गन्ध की तरह
तुम्हारे भीतर-बाहर भर जाएगा।
क्योंकि तुम जब घुटनों से सिर उठाओगी

तब बाहर मेरी आकृति नहीं
यह धुंधलाती शाम
और आँच पर जगी एक हल्की-सी भाप
देख सकोगी
जिसे इस अंधेरे में
तुम्हारे लिए पिघलकर
मैं छोड़ गया होऊँगा।

3 comments:

Unknown said...

Sarveshwar jee's poems are so simple yet so profound...here's the other one:


पोस्टमार्टम की रिपोर्ट


गोली खाकर
एक के मुँह से निकला-
'राम'।

दूसरे के मुँह से निकला-
'माओ'।

लेकिन
तीसरे के मुँह से निकला-
'आलू'।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।


Mukesh Anand

Unknown said...

Hi Prasad,

It's nice to see that you are doing a great service to a relatively marginalised language - Hindi - even while living in a southern state. That only goes to show your love for literature and art. I guess that brings you in the league of greats like M.S. Sathyu, Girish Karnad & many others. Keep it up!


Mukesh Anand

Manjunath said...

Thanks Mukesh! Hindi literature and the rich texture it adds to life is fulfilling.

Marginalized it is, but still has so much to offer that it will all come back in a few years.